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ધ્રોલ રજવાડું ધ્રોલ સ્ટેટ

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ધ્રોલ રજવાડું
બ્રિટિશ ભારતનું રજવાડું
૧૫૯૫–૧૯૪૮

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                      Coat of arms

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ચંદ્રસિંહજી દિપસિંહજી

ઇતિહાસ
• સ્થાપના ૧૫૯૫
• ભારતની સ્વતંત્રતા ૧૯૪૮
વિસ્તાર
• ૧૯૦૧ ૭૩૨ km2 (૨૮૩ sq mi)
વસતિ
• ૧૯૦૧ ૨૧,૯૦૬
ગીચતા ૨૯.૯ /km2  (૭૭.૫ /sq mi)

ધ્રોલ રજવાડું બ્રિટિશ રાજ દરમિયાન ચારે બાજુથી અન્ય રાજ્યોથી ઘેરાયેલ એવું ભારતનું એક રજવાડું હતું.

ઐતહાસિક એવા કાઠિયાવાડના હાલાર વિસ્તારનું ધ્રોલ શહેર તેનું પાટનગર હતું. ધ્રોલ સ્ટેટ બોમ્બે પ્રેસિડેન્સીની કાઠિયાવાડ એજન્સીનું ભાગ હતું. ધ્રોલ રજવાડાના કુટુંબ અને સ્થાપકના ગામો ધ્રોલ ભાયાત તરીકે ઓળખાતા હતા.

ઇતિહાસ

ધ્રોલ રજવાડાની સ્થાપના ૧૫૯૫માં નવાનગર સ્ટેટના સ્થાપક જામ રાવલના ભાઇ જામ હરધોલજીએ કરી હતી. રાજવી કુટુંબ જાડેજા વંશના સૌથી અગ્રણી શાખાના રાજપૂતો હતા, જેઓ શ્રીકૃષ્ણના વંશજ છે.

૧૮૦૭માં ધ્રોલ રજવાડું બ્રિટિશ આશ્રિત રાજ્ય બન્યું. ૧૮૯૯-૧૯૦૦માં પડેલા દુષ્કાળથી રાજ્યની વસતી ૧૮૯૧માં ૨૭,૦૦૭ થી ૧૯૦૧માં ઘટીને ૨૧,૯૦૬ થઇ ગઇ હતી. ૫ ફેબ્રુઆરી ૧૮૪૮ના રોજ રાજ્યના છેલ્લા શાસક ઠાકુર સાહેબ ચંદ્રસિંહજી દિપસિંહજીએ ભારતમાં ભળી જવા માટેની સંધિ પર હસ્તાક્ષર કર્યા હતા.

શાસકો
રાજ્યના શાસકોને ‘ઠાકુર સાહેબ’ બિરુદ મળેલું. તેમને ૯ તોપોની સલામીનો હક્ક મળેલો.

ઠાકુર સાહેબો
૧૫૯૫ – …. હરધોલજી
…. – …. જસોજી હરધોલજી
…. – …. બમનયાનજી જસોજી
…. – …. ધોલજી બમનયાનજી પ્રથમ
…. – ૧૬૪૪ મોદીજી હરધોલજી
૧૬૪૪ – ૧૭૦૬ કાલોજી પ્રથમ પંચનજી
૧૭૦૬ – ૧૭૧૨ જુનોજી પ્રથમ કાલોજી
૧૭૧૨ – ૧૭૧૫ કેતોજી જુનોજી
૧૭૧૫ – ૧૭૧૬ કાલોજી દ્વિતિય જુનોજી (મૃ. ૧૭૧૬)
૧૭૧૬ – ૧૭૬૦ વાઘજી જુનોજી
૧૭૬૦ – ૧૭૮૧ જયસિંહજી પ્રથમ વાઘજી
૧૭૮૧ – ૧૭૮૯ જુનોજી દ્વિતિય જયસિંહજી
૧૭૮૯ – …. નાથોજી જુનોજી
…. – ૧૮૦૩ મોદીજી નાથોજી
૧૮૦૩- ૧૮૪૪ ભૂપતસિંહજી મોદીજી
૧૮૪૫- ૧૮૮૬ જયસિંહજી દ્વિતિય ભૂપતસિંહજી (જ. ૧૮૨૪ – મૃ. ૧૮૮૬)
૨૬ ઓક્ટોબર ૧૮૮૬ – ૩૧ જુલાઇ ૧૯૧૪ હરિસિંહજી જયસિંહજી (જ. ૧૮૪૬ – મૃ. ૧૯..)
૨ સપ્ટેમ્બર ૧૯૧૪ – ૩૧ ઓગસ્ટ ૧૯૩૭ દૌલતસિંહજી હરિસિંહજી (જ. ૧૮૬૪ – મૃ. ૧૯૩૭)
૩૧ ઓગસ્ટ ૧૯૩૭ – ૧૯૩૯ જોરાવરસિંહજી દિપસિંહજી (જ. ૧૯૧૦ – મૃ. ૧૯૩૯)
૧૦ ઓક્ટોબર ૧૯૩૯ – ૧૫ ઓગસ્ટ ૧૯૪૭ ચંદ્રસિંહજી દિપસિંહજી (જ. ૧૯૧૨ – મૃ. ….)

History & Literature

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जाडेजा ठाकोर हरिसिंहजी : जिन्होंने अकाल से अपनी प्रजा बचाने पूरा खजाना खाली कर दिया/ Jadeja Thakor Harisinhji

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गुजरात के ध्रोल नगर की यह बात है जब छप्पनिया अकाल में राजा ने अपनी प्रजा के लिए पूरा खजाना खाली कर दिया…

          छप्पनिया अकाल ने इतनी दहशत फेलाई थी की ध्रोल नगर में जेसे हाथ में यमपाश लिए मानव पशु पक्षी को भक्ष करने राक्षस की तरह घूम रहा हो, प्रजा अन्न-जल के लिए आश लगाए बेठी है, सब जगह मानव मृतदेह से भरी ध्रोल की धरती कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद की जमीन जेसी लग रही थी…
          हब्सी के मुह जेसी काली रात छाने लगी थी, सन्नाटे की चादर बिछ रही थी, भूखेप्यासे भी निंद्रा की शरण में और कुछ चिरनिंद्रा में सो रहे थे…
         बस जाग रहे थे तो एक ही व्यक्ति वे थे ध्रोल के सुवांग धणी जाडेजा ठाकोर हरिसिंहजी, जगह जगह जल रहे अग्निदाह की अग्नि से उनका आत्मा भी जल रहा था, प्रजा की पीड़ा से वे दुखी हो रहे थे, काळ के कराल पंजे की झपट से प्रजा को बचाने वे आतुर हुए, मनोमंथन बढ़ने लगा, महल के आलिशान पलंग पर सो रहे थे पर आँखों में नींद नही आ रही, प्रजा हे तो राजा है, प्रजा के हित में आज उपयोग किया धन कल वापस आये ना आये पर प्रजा को आज इस आफत से बचाना राजा का धर्म है, फिर चाहे अपना शरीर भी क्यों ना बेचना पड़े… तभी में सगी अर्थ में राजा कहलाऊँ…”

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Jadeja Thakor Harisinhji Of Dhrol

          मनोमन ऐसा संकल्प कर दरियादिल राजा घड़ीभर नींद कर लेते है, रक्तभरा लाल सूर्य अँधेरे के गढ़ को तोड़ता हुआ ध्रोल की धरती पर सूर्योदय हुआ, रणयोद्धा की रक्तरंजित तलवार से तेजकिरणो ने आसमान भर दिया,ठाकोर हरिसिंहजी ने दरबार बुलाया, दीवान, महेता पर सभासदों के सामने अपना मनसूबा बताया की “प्रजा की पीड़ा दूर करना अपना धर्म है” राजा की आवाज में अंतर का दर्द भरा हुआ था, प्रजा प्रेम उभर रहा रहा था,
लेकिन बापू, यह तो कुदरती आफत है…! राजा के प्रजाप्रेम को पीछे धकेल देने वाला उत्तर एक सभासद ने दिया,
ऐसा उत्तर देने वाले पर क्रोधित दृस्टि कर जिस के ह्रदय में हरी ने स्थान ले लिया ऐसे राजा ने कहा : मुझे मेरी प्रजा को बचाना हे, अबोल पशुओ को मृत्यु के मुख से बचाना है, यह मेरा अफर निर्णय हे।
लेकिन इतनी बड़ी आफत से हम नही निपट सकते, किसी सभासद ने फिर कहा, राज का तीसरा हिस्सा भायातो के पास है,
राजा हरिसिंहजी अपनी बात पर अडग रहे, में प्रजा के लिए अपने आप को बेचने भी तैयार हु, भायात भी मेरी प्रजा ही है, में निस्पक्ष सारी प्रजा के हिट का कार्य करना चाहता हु, राज के पास जो धन है वः प्रजा ने ही कमा कर दिया है, वही धन प्रजा को बचाने की लिए खर्च करना है, आप लोगो को पूरी निष्ठां से काम करना होगा, किसी ने भी दगा किया उसे कड़ी सजा होगी, यह याद रखना,
उसी घड़ी से राजा ने दानापानी की सुविधा प्रजा के लिए खुल्ली कर दी,
          राहतकाम शुरू करने का फरमान दे दिया गया, खारवा और वांकिया गाँव की सीमा में पाळ का काम शुरू किया गया, दूसरी तरफ सरपदड से वणपरि गाँव तक पक्की सड़क निर्माण का काम शुरू हुआ, ध्रोल में दो कुए का खोदकाम आरंभ हुआ, गरेडिया में तालाब बनाया गया, राजवी रैयत के लिए हरिसिंहजी ने दिल के दरवाजे खुले छोड़ दिए, ध्रोल के पादर मे खुदवाये दोनो कुए मे पानी उमट पडा, उस पर नौ कोंस जोंते गये, दिलावर दिल के राजा पर वरुणदेव भी प्रसन्न हुए, लोगो को रोजी-रोटी मिली, पीडीत प्रजा का पोकार शमने लगा, लोगो की जान मे जान आयी, ठाकोर हरिसिंहजी की जयजयकार होने लगी, ध्रोल ने अकाल को परास्त किया ये बात चारोओर फैल गयी, ये बात सुन अंग्रेज अमलदार मि.मोरिसन, मि.वुड और चमनराय हरराय ध्रोल पहुंचे और ठाकोर हरिसिंहजी को प्रजा के लिये पैसो को पानी की तरह बहाने के लिये धन्यवाद दिये |

            अकाल जब खत्म हुआ तब राज का खजाना खाली था, पैसे नही थे लेकिन प्रजा के सीने मे जान थी यही ठाकोर हरिसिंहजी के मन बडी बात थी |

>> नोंध :-

* ठाकोर हरिसिंहजी उनके पिता जयसिंहजी की मृत्यु के बाद ता. 4-11-1886 के रोज गद्दी पर बैठे |
* वे संस्कृत के जानकार थे |
* उन्होने ध्रोल मे धर्मशाला, दरबारगढ मे सुशोभित महल, सरपदड मे एक कचहरीहोल बनवाये थे |
* उनका विवाह पालिताणा, लाठी और दरेड की राजकुमारीओ के साथ हुआ था |
* भोपाल की बेगम को चांद दिलाने के लिये मुंबई मे आयोजित दरबार मे 1876 मे प्रिन्स ओफ वेल्स से वे मिले थे ||
सौजन्य : दौलत भाई भट्ट

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