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ભીતર નો ભીંજાણા

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કાળમીંઢ પત્થરા કેરા ભીતર નો ભીંજાણા,
મૂશળધાર માથે બારેય મેહુલા મંડાણા.
સંતના સમાગમથી જરા નવ સમજ્યા,
માયા મમતામાં જેના મનડાં મૂંઝાણા.
કાળી ઉન કેરાં કાપડ કોઇ રંગરેજથી,
લાખ ઉપાયે બીજા રંગે નો રંગાણા.ફુલડાંની સેજે એને નીંદરાયું નાવે,મછિયાંની ગંધે એના તનડાં ટેવાણાં.
પિંગલ કહે છે પ્યાલા દૂધ ભરી પાયું,

વિષધરનાં વર્તન જરિયે નવ બદલાણા.

📌કવિઃ પિંગળશીભાઇ ગઢવી.

चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमें आखर मर जाना:- पिंगलशि नरेला कृत Chit chet sihana fir nahi aana aakhar jag mein mar jana…

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.               दुहो

हर पर विपति हाथसे डर पर दारा दाम
धर ईश्वर नित ध्यानमें कर नेकी के काम

             छंद त्रिभंगी

कर नेकी करसे डरपर धरसे पाक नजरसे धर प्रीती
जप नाम जीगरसे बाल उमरसे जसले जरसे मन जीती
गंभीर सागरसे रहे सबरसे मिले उधरसे परवाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

मद ना कर मनमे मिथ्या धनमे जोर बदनमे जोबनमे
सुख हे न स्वपनमे जीवन जनमे चपला धनमे छनछनमे
तज वेर वतनमे द्वेश धरनमे नाहक इनमे तरसाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

जुठा हे भाइ बाप बडाइ जुठी माइ माजाइ
जुठा पित्राइ जुठ जमाइ जुठ लगाइ ललचाइ
सब जुठ सगाइ अंत जुदाइ देह जलाइ समसाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

कोउ अधिकारी भुजबलभारी कोउ अनारी अहंकारी
कोउ तपधारी फल आहारी कोउ विहारी वृर्तधारी
त्रस्ना नहीं टारी रह्या भीखारी अंत खुवारी उठ जाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमे आखर मर जाना

तज पाप पलीती असत अनीति भ्रांती भीति अस्थिती
सज न्याय सुनीति उत्तम रीती प्रभु प्रतिति धर प्रीती
इन्द्री ले जीतीसुख साबिती गुण माहिती दर्ढ ज्ञाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमें आखर मर जाना

दुनिया दो रंगी तरक तुरंगी स्वारथ संगी ऐकंगी
होजा सतसंगी दूर कुसंगी ग्रहेन टंगी जन जंगी
पिंगल सुप्रसंगी रचे उमंगी छंद त्रिभंगी सरसाना
चित चेत सिंहाना फीर नहीं आना जगमें आखर मर जाना

रचियता :- पिंगळशी भाइ नरेला
साभार :- हरि गढवी।

History & Literature

कहे राधे प्यारी में बलिहारी गोकुल आवो गिरधारी

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आषाढ ऊच्चारं, मेघ मलारं, बनी बहारं जलधारं .
दादुर डकारं , मयुर पुकारं, सरिता सारं विस्तारं .
ना लही संभारं , प्यास अपारं , नंद कुमारं निरधारी .
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी , गौकुळ आवो गीरधारी !!

श्रावण जळ बरसे , सुन्दर सरसे , बादळ वरसे अंबर से .
तरवर गिरवरसे, लता लहर से , नदियां सरसे सागर से .
दंपति दुख दरसे , सैज समरसे , लगत जहर से दुखकारी .कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुल आवो गिरधारी !!

भाद्रव भरिया, गिरवर हरिया, प्रेम प्रसरिया तन तरिया .
मथुरा में गरिया, फैर न फरिया, कुब्जा वरिया वश करिया.
ब्रजराज बिसरिया,काज न सरिया,मन नहीं ठरिया हुं हारी.
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुळ आवो गिरधारी !!

आसो महिनारी, आश वधारी, दन दशरारी दरशारी .
नव निद्धि निहारी, चड़ी अटारी, वार संभारी मथुरारी .
वृषभानु दुलारी, कहत पुकारी विनवीये वारी वारी .
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुळ आवो गिरधारी !!

कहुं मासं काती, तिय मदमाती, दिप लगाती रंग राती .
मंदिर महलाती, सबे सुहाती, मैं हरखाती जझकाती .
बिरहे जल जाती, नींद न आती, लखी नपाती मोरारी .
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुळ आवो गिरधारी !!

मगसर शुभ मासं, धर्म प्रकाशं, हिये हुल्लासं जनवासं .
सुन्दर सहवासं, स्वामी पासं, विविध विलासं रनिवासं .
अन्न नहीं अपवासं, व्रती अकाशं, नहीं विश्वासं मोरारी .
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुळ आवो गीरधारी !!

पौषे पछताई, शिशिर सुहाई, ठंड लगाई सरसाई .
मन मथ मुरझाई, रहयो न जाई, बृज दुखदाई वरताई .
शुं कहुं समझाई, वैद बताई, नहीं जुदाई नर नारी .
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुल आवो गिरधारी !!

माह महिना आये, लगन लखाये, मंगळ गाये रंग छाये .
बहु रैन बढाये, दिवस घटाये, कपट कहाये वरताये .
वृज की वनराये, खावा धाये, वात न जाय विस्तारी .
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुळ आवो गिरधारी !!

फागुन प्रफुल्लितं, बेल ललितं, कीर कलीतं कौकीलं .
गावत रस गीतं, वसन्त वजीतं, दन दरसीतं दुख दिलं .
पहेली कर प्रीतं, करत करीतं, नाथ अनीतं नहीं सारी .
कहे राधे बलिहारी,मैं बलिहारी,गौकुळ आवो गिरधारी!!

मन चैत्र मासं, अधिक ऊदासं, पति प्रवासं नहींपाये .
बन बने बिकासं, प्रगट पलासं,अंब फळांसं फल आये.
स्वामी सहवासं, दिये दिलासं, हिये हुल्लासं कुबजारी .
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुळ आवो गिरधारी !!

वैशाखे वादळ, पवन अप्रबळ,अनल प्रगट थल तपति अति.
सौहत कुसुमावल, चंदन शीतल, हुई नदियां जळ मन्द गति.
कियो हमसे छळ, आप अकळ कळ, नहीं अबळा पत पतवारी .
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुळ आवो गिरधारी !!

जेठे जगजीवन, सुके बन बन, घोर गगन घन चढत घटा.
भावत नहीं भौजन, जात वरस दन, करत प्रिया तन काम कटा .
तड़फत ब्रज के जन, नाथ निरंजन, दिया न दरशन दिलधारी .
कहे राधे प्यारी, मैं बलिहारी, गौकुळ आवो गिरधारी !!

रचयिता : चारण पींगळशी पाताभाई नरेला

Divyrajsinh Sarvaiya (Dedarda)